Friday, June 8, 2018

निगाह नीची रखो

पर्दा करो क्योंकि तुम किसी बाप का ग़ुरूर हो,

पर्दा करो क्योंकि तुम किसी भाई की ग़ैरत हो,

पर्दा करो क्योंकि तुम किसी शौहर की इज़्ज़त हो,

पर्दा करो क्योंकि तुम किसी घर की ज़ीनत हो,

पर्दा करो क्योंकि पर्दा हया का ज़ेवर है,

पर्दा करो क्योंकि पर्दे मे औरत की शान है,

पर्दा करो क्योंकि तुम कोई मामूली सामान नही हो,

बल्कि इस्लाम की शहज़ादी हो
और कोई शहज़ादी इस तरह मामूली नही
ज़िसके उपर हर किसी की निगाह उठ जाये..

👌👌👌👌👌👌👌
मर्दो के लिए.....
निगाह नीची रखो - कि तुमसे तुम्हारी माँ की तरबियत की पहचान होगी, वही माँ जिसके क़दमों में जन्नत है।

निगाह नीची रखो - कि वो भी किसी की बहन है तुम्हारी बहन की तरह।

निगाह नीची रखो - कि तुम अपनी बीवी का एतबार, वफ़ा और ग़ुरूर हो, उसकी नज़रें नीची हो जाती है जब कोई उसे ताना देता है कि "हाँ पता है,तुम्हारे शौहर तुम्हें कितना चाहते हैं ?"

निगाह नीची रखो - कि तुम्हें अल्लाह ने औरतों पर क़व्वाम( संरक्षक,यानि अच्छी तरह रक्षा करने वाला ) बनाया है।

निगाह नीची रखो - कि ये शराफ़त की अलामत है।

निगाह नीची रखो - कि हुज़ूर, खलीफ़ा और सहाबा निगाह नीची रखते थे।

निगाह नीची रखो - क्योंकि तुम कोई मामूली इंसान नहीं, मुसलमान हो, इमानवाले हो, सबसे बेहतरीन उम्मह के पैरोकार हो।

निगाह नीची रखो - कि तुम इस्लाम के शहज़ादे हो, क़ुरआन में अल्लाह ने पहले मर्दों को निगाह नीची रखने को कहा है।

निगाह नीची रखो - ताकि ग़ैर मज़हब की औरतें कहें कि ईमानवाले मर्द कितने शरीफ होते हैं। मुसलमानों के मोहल्ले, गली,गाँव में हर औरत सुरक्षित है।

निगाह नीची रखो - ताकि दंगों के बाद ग़ैर मजहब की औरतें इस बात की गवाही दें कि ईमानवाले मर्द, लड़ाई झगड़ों और दंगों में भी औरतों की इज़्ज़त का ख़याल करते हैं।

Saturday, June 2, 2018

मस्जिद-ए-नबवी

मस्जिद-ए-नबवी

हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जमाने में इस्लाम के सारे मामलात मस्जिद-ए-नबवी में हल होते थे ।

मस्जिद का इस्तेमाल मुसलमान अपनी जिंदगी से ताल्लुक रखने वाले हर मामलों के मशवरा के लिए करते थे ।

ज्यादातर आहकाम ए नबवी मस्जिद ए नबवी से जारी हुए ।

यहां बाहर के लोग आते थे और इस्लाम के बारे में जानते थे ।

कुछ सहाबी मस्जिद में ही रहते थे ।

इस्लामी निजाम में मस्जिदें मुसलमानों का मरकज़ हुआ करती थी ।

जिसमें मुस्लिम मिलते थे और अपने आपस के हालात का बयां करते थे और मशवरे और एहकाम जारी होते थे ।

मस्जिदों पर ताले नहीं थे मस्जिदों में कारोबार नहीं होता था ।

मस्जिदों में नमाज होती थी और इस्लाम से ताल्लुक रखने वाले अपने मसाइल के हल के लिए मस्जिदों का रुख करते थे ।

आज मस्जिदें बंद रहती हैं सिर्फ नमाजों के वक़त खुलती हैं सिर्फ नमाज होती है ।

इमामों का काम सिर्फ नमाज तक रह गया है ।

आओ हम सब मिलकर हमारे मोहल्ले की हमारे शहर की हमारी गली की मस्जिदों को मस्जिद-ए-नबवी की तर्ज पर बनाएं ।

और हम सब मिलकर अपने इलाके के लोगों को उस से जोड़ें उनके मसाइल को हल करें उनकी मदद करें उनकी दुनियावी मामलात में उनके साथ खड़े हो ।

बैतूल माल बनाएं जिसमें गरीबों बेसहारा लोगों यतीमों विधवाओं तलाकशुदा औरतों बीमारों की मदद करें।

और अपने इलाके के मसाइल को हल करें आपस के झगड़ों को निपटाने में उनकी मदद करें ।

मुसलमानों को दुनिया के अंदर फिर आगे बढ़ने की यही तरतीब है ।

या अल्लाह हमारी मस्जिदों को मस्जिद-ए-नबवी की तर्ज पर बना दे जो भले ही दिखने में सादा हो लेकिन हमारे मुसलमान भाइयों के लिए अपनी परेशानियों अपनी मुसीबतों ,तकलीफों को दूर करना कि करने की जगह हो ।

हर मस्जिद में कुछ 1 लोग इकट्ठा हो एक छोटी सी शूरा बनाएं मशवरा करें और लोगों को मस्जिद के निजाम से जोड़ें जैसा हमारे नबी अकरम सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम ने किया था ।

मस्जिदों का निजाम ऐसा कर दे कि हर मुसलमान अपने हर मामले के लिए मस्जिद का रुख करें ।

अगर नबी से मोहब्बत है अल्लाह से मोहब्बत है तो हमें अपने मुसलमान भाइयों से भी मोहब्बत करना होगी हमें गरीबों , मिस्कीनों से भी मोहब्बत करना होगी हमें जरुरतमंदों से भी मोहब्बत करना होगी ।

आओ हम सब मिलकर हम सब की तकलीफों को दूर करने का जरिया बने।

आमीन

अल्लाह हमारी कोशिशों को कुबूल फरमाए

Saturday, December 2, 2017

माँ

गिनती नही आती मेरी माँ को यारों,
मैं एक रोटी मांगता हूँ वो हमेशा दो ही लेकर आती है.☺
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जन्नत का हर लम्हा….दीदार किया था
गोद मे उठाकर जब मॉ ने प्यार किया था
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सब कह रहें हैं
              आज माँ का दिन है
वो कौन सा दिन है..
              जो मां के बिन है
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*सन्नाटा छा* गया *बटवारे* के *किस्से* में...🙏

जब *माँ* ने पूछा *मैं* हूँ किसके *हिस्से* में.....!!!
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*✍.... घर की इस बार*

*मुकम्मल तलाशी लूंगा!*

*पता नहीं ग़म छुपाकर*

*हमारे मां बाप कहां रखते थे...?*😔
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*एक अच्छी माँ हर किसी*
*के पास होती है लेकिन...*

*एक अच्छी औलाद हर*
*माँ के पास नहीं होती...*
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जब जब कागज पर लिखा , मैने 'माँ' का नाम
कलम अदब से बोल उठी , हो गये चारो धाम
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माँ से छोटा कोई शब्द हो तो बताओ

उससे बडा भी कोई हो तो भी बताना.....
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मंजिल दूर और सफ़र बहुत है .
छोटी सी जिन्दगी की फिकर बहुत है .
मार डालती ये दुनिया कब की हमे .
लेकिन "माँ" की दुआओं में असर बहुत है .🙂
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*👵माँ को देख,*
*मुस्कुरा😊 लिया करो..*

*क्या पता किस्मत में*
*हज़ लिखा ही ना हो*
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*​मौत के लिए बहुत रास्ते हैं ​पर*....
  *जन्म लेने के लिए ​केवल*
           *माँ​​* ✍.
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माँ के लिए क्या लिखूँ ? माँ ने खुद मुझे लिखा है ✍🙏 😘
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*दवा असर ना करें तो*
*नजर उतारती है*

*माँ है जनाब...*
*वो कहाँ हार मानती है*।
Accha lge to jrur dosto ko send krna... maa..aakhir ..maa..hoti..hai.

Tuesday, October 10, 2017

आखिर यह भी तो नही रहेगा

*""*

*🔵 एक फकीर अरब मे हज के लिए पैदल निकला। रात हो जाने पर एक गांव मे जाफ़र नामक व्यक्ति के दरवाजे पर रूका। जाफ़र ने फकीर की खूब सेवा किया। दूसरे दिन जाफ़र ने बहुत सारे उपहार दे कर बिदा किया। फकीर ने दुआ किया -"खुदा करे तू दिनों दिन बढता ही रहे।"*

*🔴 सुन कर जाफ़र हंस पड़ा और कहा -"अरे फकीर! जो है यह भी नहीं रहने वाला है"। यह सुनकर फकीर चला गया ।*

*🔵 दो वर्ष बाद फकीर फिर जाफ़र के घर गया और देखा कि जाफ़र का सारा वैभव समाप्त हो गया है। पता चला कि जाफ़र अब बगल के गांव में एक जमींदार के वहां नौकरी करता है। फकीर जाफ़र से मिलने गया। जाफ़र ने अभाव में भी फकीर का स्वागत किया। झोपड़ी मे फटी चटाई पर बिठाया ।खाने के लिए सूखी रोटी दिया।*

*🔴 दूसरे दिन जाते समय फकीर की आखों मे आंसू थे। फकीर कहने लगा अल्लाह ये तूने क्या किया?*

*🔵 जाफ़र पुनः हंस पड़ा  और बोला -"फकीर तू क्यों दुखी हो रहा है? महापुरुषों ने कहा है -"खुदा  इन्सान को जिस हाल मे रखे  खुदा को धन्यवाद दे कर खुश रहना चाहिए।समय सदा बदलता रहता है और सुनो यह भी नहीं रहने वाला है"।*

*🔴 फकीर सोचने लगा -"मैं तो केवल भेस से फकीर हूं सच्चा फकीर तो जाफ़र तू ही है।"*

*🔵 दो वर्ष बाद फकीर फिर यात्रा पर निकला और जाफ़र से मिला तो देख कर हैरान रह गया कि जाफ़र तो अब जमींदारो का जमींदार बन गया है। मालूम हुआ कि हमदाद जिसके वहां जाफ़र नौकरी करता था वह संतान विहीन था मरते समय अपनी सारी जायदाद जाफ़र को दे गया।*

*🔴 फकीर ने जाफ़र से कहा - "अच्छा हुआ वो जमाना गुजर गया। अल्लाह करे अब तू ऐसा ही बना रहे।"*

*🔵 यह सुनकर जाफ़र फिर हंस पड़ा  और कहने लगा - "फकीर!  अभी भी तेरी नादानी बनी हुई है"।*

*🔴 फकीर ने पूछा क्या यह भी नही रहने वाला है? जाफ़र ने उत्तर दिया -"या तो यह चला जाएगा या फिर इसको अपना मानने वाला ही चला जाएगा। कुछ भी रहने वाला नहीं है। और अगर शाश्वत कुछ है तो वह है परमात्मा और इसका अंश आत्मा। "फकीर चला गया ।*

*🔵 डेढ साल बाद लौटता है तो देखता है कि जाफ़र का महल तो है किन्तु कबूतर उसमे गुटरगू कर रहे हैं। जाफ़र कब्रिस्तान में सो रहा है। बेटियां अपने-अपने घर चली गई है।बूढी पत्नी कोने मे पड़ी है ।*

*"कह रहा है आसमां यह समां कुछ भी नहीं।*
*रो रही है शबनमे नौरंगे जहाँ कुछ भी नहीं।*
*जिनके महलों मे हजारो रंग के जलते थे फानूस।*
*झाड़ उनके कब्र पर बाकी निशां कुछ भी नहीं।"*

*🔵 फकीर सोचता है -" अरे इन्सान ! तू किस बात का  अभिमान करता है? क्यों इतराता है? यहां कुछ भी टिकने वाला नहीं है दुख या सुख कुछ भी सदा नहीं रहता।*

*🔴 तू सोचता है - "पड़ोसी मुसीबत मे है और मैं मौज में हूं। लेकिन सुन न मौज रहेगी और न ही मुसीबत। सदा तो उसको जानने वाला ही रहेगा।*

*"सच्चे इन्सान हैं वे जो हर हाल मे खुश रहते हैं।*
*मिल गया माल तो उस माल मे खुश रहते हैं।*
*हो गये बेहाल तो उस हाल मे खुश रहते हैं।"*

*🔵 धन्य है जाफ़र तेरा सत्संग  और धन्य हैं तुम्हारे सद्गुरु। मैं तो झूठा फकीर हूं। असली फकीर तो तेरी जिन्दगी है।*

*🔴 अब मैं तेरी कब्र देखना चाहता हूं। कुछ फूल चढा कर दुआ तो मांग लूं।*

*🔵 फकीर कब्र पर जाता है तो देखता है कि जाफ़र ने अपनी कब्र पर लिखवा रखा है-*

*🌹 "आखिर यह भी तो नहीं रहेगा"*

*JAHID*

Wednesday, October 4, 2017

कितना प्यारा SMS है सबको शेयर करें*

*कितना प्यारा SMS है सबको शेयर करें*

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*अल्लाह का वादा है 'जो तेरे* *नसीब में है वो तुझे ज़रूर मिलेगा,* *चाहे वो दो पहाड़ो के बीच क्यों न हो...* *और जो तेरे नसीब में नहीं वो* *हरगिज़ नहीं मिलेगा, चाहे वो तेरे दोनों होठों के दरमियान क्यों ना हो* *बेशक अल्लाह बेनियाज़ और बड़ी रहमत वाला है*
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*हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ رضي الله عنه. फरमाते है - किसी को दुःख देने वाला कभी खुश नहीं रहे सकता*
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*हज़रत उमर फारूक رضي الله عنه फरमाते है* *किसी की बे -बसी पे मत हँसो कल ये वक़्त तुम पर भी आसकता है।*
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*हज़रत उस्मान गनी رضي الله عنه. फरमाते है*
*किसी की आँख तुम्हारी वजह से नम न हो*
*क्योंकी तुम्हे उस के हर आंसू का क़र्ज़ चुकाना होगा*
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*हज़रत अली رضي الله عنه. फरमाते है -* *मज़लूम और नमाज़ी की आह से डरो,* *क्योंकि आह किसी की भी हो* *अर्श को चीर कर اللّه के पास जाती है*
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*हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ رضي الله عنه. फरमाते है*
*उस दिन पे आंसू बहाओ जो तुम ने नेकी के बिना गुज़ारा हो*
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*हज़रत उमर फारूक رضي الله عنه.* *फरमाते है - ज़ालिमों को माफ़ करना मज़लूमों पे ज़ुल्म है*
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*हज़रत उस्मान गनी رضي الله عنه. फरमाते है- जुबां दरुस्त हो जाये तो*
*दिल भी दरुस्त हो जाता है*
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*हज़रत अली رضي الله عنه. फरमाते है-* *जहा तक हो सके लालच से* *बचो,लालच में ज़िल्लत ही ज़िल्लत है*
*दुसरो को इस तरह माफ़ करो जिस तरह الله तुम्हे माफ़ करता है*
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Sunday, October 1, 2017

कर्बला

जब इमाम हुसैन हज करने के लिए मदीना से मक्का आए तो उन्हें मालूम हुआ कि यहां यज़ीद के लोग उनका कत्ल कर सकते हैं तो वो मक्का से बिना हज किए ही चले गए। क्योंकि वो अल्लाह के पाक घर में खून-खराबा नहीं चाहते थे।  वो मक्का से इराक के शहर कूफा पहुंचे।  उन्होंने कूफे के लोगों से मदद मांगी।  यज़ीद के सैनिक इमाम हुसैन की तलाश में कूफा भी पहुंच गए।  इमाम हुसैन ने अपने पैसों से कर्बला में कुछ जमीन खरीदी और वहां अपने तंबू गाड़ दिए और अपने परिवार के 72 सदस्यों के साथ इन तंबुओं में ठहर गए।  यज़ीद का हजारों का लश्कर भी कर्बला के मैदान में पहुंच गया। प्राचीन परंपराओं के अनुसार कर्बला का अर्थ है ईश्वर की पवित्र भूमि। कहते हैं ये बस्ती कई बार उजड़ी और कई बार आबाद हुई।  जब यज़ीद की सेना कर्बला पहुंची तो इमाम हुसैन को मालूम हुआ कि फौजी प्यासे हैं तो उन्होंने फौज को पानी पिलवाया।  इमाम हुसैन का कहना था कि हमारी लड़ाई खिलाफत के पद की नही बल्कि नाना (हज़रत मुहम्मद) के दीन को बचाने की है. कुछ इतिहासकारों का मत है यज़ीद ने अपने कमांडर उमरे साद को आदेश दिया था कि वो इमाम हुसैन और उनके परिवार को शाम (सीरिया) ले कर आए और वो यहां उनसे बैत करने को कहेगा।  लेकिन इसी दौरान शिम्र, इब्ने जियाद का खत लेकर पहुंचता है जिसमे लिखा था कि तुम इमाम हुसैन को कत्ल कर दो नहीं तो शिम्र को सेनापति बना दो। बहरहाल हुकूमत हो या खिलाफत हमेशा षडयंत्र करने वाले सक्रिय रहते हैं। इसी कर्बला के मैदान में जहां इमाम हुसैन ने अपने विरोधी की सेना को पानी पिलवाया।  वहीं उनके विरोधियों ने फुरात नदी से निकली नहर पर कब्जा कर लिया और इमाम हुसैन के परिवार का पानी बंद कर दिया।  इमाम हुसैन जानते थे कि हजारों फौजियों के मुकाबले में उनके 72 साथी शहीद हो जाएंगे।  वो चाहते तो खुद समेत सबको बचा सकते थे लेकिन उनकी नजर में दीनी उसूल ज्यादा अहम थे।इमाम हुसैन तीन दिन तक भूखे-प्यासे औरतों और बच्चों से सब्र करने को कहते रहे।  वो अपने छह महीने के बेटे को पानी पिलाने नहर पर ले गए।  उनको उम्मीद थी कि इस बच्चे को तो पानी मिल ही जाएगा। लेकिन जालिम फौजियों ने उस बच्चे को भी नही बख्शा और एक तीन कीलों वाला तीर उसके गले मे दे मारा जो आर-पार होकर इमाम हुसैन के बाजू में जा धंसा।  इमाम हुसैन के सामने उनके छह महीने के बेटे को कत्ल कर दिया गया लेकिन उन्होंने अपना इरादा न बदला। नौ मोहर्रम की रात को इमाम हुसैन अपने परिवार के लोगों के साथ रात भर दुआ करते रहे। वो अल्लाह से दुआ करते रहे कि अल्लाह उनकी कुर्बानी को कबूल कर ले और दीन व शरीयत को बचा ले। अगले दिन 10 मोहर्रम 61 हिजरी यानी 10 अक्टूबर, 680 ई. को कर्बला के मैदान में एक अजीब जंग हुई जिसमें हजारों प्रशिक्षित सैनिकों का मुकाबला छोटे-छोटे बच्चों और और औरतों समेत 72 भूखे-प्यासे लोगों से था।  नतीजा सबको मालूम था।  फिर भी लड़ना था। इंसानियत के लिए, सच्चाई के लिए, ईमान के लिए और शहादत के लिए। सभी मर्दों को कत्ल कर दिया गया।  बच्चों को मौत के घाट उतार दिया गया। औरतों को कैदी बना लिया गया।  इमाम हुसैन का कटा सिर नेजे (भाले) पर शहर की गलियों में घुमाया गया।  जालिमों ने अपने जुल्म की हर इंतेहा का प्रदर्शन किया लेकिन इमाम हुसैन से बैत न करा सके। इस तरह पैगंबर हज़रत मुहम्मद के नवासे और हज़रत अली के बेटे हज़रत इमाम हुसैन ने शहादत देकर अधर्मी और अत्याचारी के खिलाफ न सिर्फ अपनी बहादुरी का परिचय दिया बल्कि अपनी धर्मपरायणता का भी उदाहरण दिया।

(फर्स्टपोस्ट के लेख का महत्वपूर्ण अंश )

Friday, July 21, 2017

देश की स्वतंत्रता के लिए मुसलमानों ने क्या किया, इस बारे में ट्रिविय

इस देश की स्वतंत्रता के लिए मुसलमानों ने क्या किया, इस बारे में ट्रिविया:

यह सम्राट औरंगजेब था जिन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी से सूरत में 1686 में भारत छोड़ने को कहा था!

अंग्रेजों के खिलाफ पहला युद्ध आजादी से लगभग 200 साल पहले पलासी की लड़ाई में लड़ा गया था, जिसमें बंगाल के नवाब सिराजुद्वाला ने 1757 में ब्रिटिश द्वारा धोखा दिया था!

अंग्रेजों के खिलाफ विजय के प्रथम लक्षण मैसूर में देखे गए थे जहां नवाब हैदर अली ने 1782 में अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था। उनके बेटे टिपू सुल्तान ने उनकी सफलता हासिल की थी, जिन्होंने 17 9 1 में उन्हें फिर से लड़ा था और अंततः 1799 में उन्हें धोखा देकर मार दिया गया था। टीपू सुल्तान युद्ध में मिसाइलों का इस्तेमाल करने वाला पहला जनरल था!

मुजाहिद आंदोलन सईद अहमद शहीद और उनके दो शिष्यों के नेतृत्व में 1824 और 1831 के दौरान सक्रिय थे और वे ब्रिटिश अधिकारियों से उत्तर-पश्चिमी प्रांत को मुक्ति में सफल रहे। सय्यद अहमद शहीद को खलीफा नामित किया गया था, लेकिन स्वतंत्रता कम ही थी और 1831 में उन्हें मार दिया गया था!

पिछले मुगल सम्राट, बहादुर शाह जफर 1857 में स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करना था। एक देशव्यापी युद्ध 31 मई 1857 को एक साथ शुरू करना था, लेकिन ब्रिटिश सेना के बीच भारतीयों ने 10 मई 1857 को पहले विद्रोह किया !

1857 की घटनाओं के बाद एक चौंकाने वाली 5,00,000 मुस्लिम मारे गए, जिनमें से 5000 उलेमा (धार्मिक विद्वान) थे। ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली से कलकत्ता तक ग्रांड ट्रंक रोड पर एक भी पेड़ नहीं था, जिस पर एलिम के शरीर को लटका नहीं पाया गया था!

भारतीय उलेमा ने अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद के लिए बुलाया और भारत को दारुल हारब (शत्रु नियंत्रण के तहत क्षेत्र) के रूप में घोषित किया। यह कॉल पूरे देश में मुस्लिमों के साथ ब्रिटिशों के खिलाफ बढ़ रहा है।

औपनिवेशिक साम्राज्य के सांस्कृतिक और शैक्षिक बंधनों से देशवासियों को मुक्त करने के लिए, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की तरह सीखने के ऊपरी केंद्रों की स्थापना 1 9वीं सदी के अंत में हुई थी, जिसे अभी भी भारत की प्रमुख विश्वविद्यालयों में गिना जाता है।

1 9 05 में शखुल इस्लाम मौलाना महमूद हसन और मौलाना उबैदुल्ला सिंधी ने रश्मी रूमाल तहरीक को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सभी भारतीय राज्यों को एकजुट करने के लिए शुरू किया था। मौलाना महमूद को माल्टा और कालापनी में उसी समय के लिए कैद किया गया जहां उन्होंने अपना अंतिम सांस ली।

इंडियन नेशनल कांग्रेस, अपनी स्थापना के समय से स्वतंत्रता के लिए 9 मुस्लिम राष्ट्रपति थे!

बैरिस्टर एम.के. गांधी ने एक मुसलमान के स्वामित्व वाले दक्षिण अफ्रीका में एक कानूनी फर्म में सेवा की, जिन्होंने 1 9 16 में अपने स्वयं के खर्चों को गांधीजी को भारत भेज दिया। यहां उन्होंने अली बिर्रद्रन (अली ब्रदर्स) के तहत अपना आंदोलन शुरू किया!

मोप्पला आंदोलन ने एक ही युद्घ में 3000 मुसलमानों को मार डाला!

असहयोग आंदोलन और स्वदेशी आंदोलन ने भारी मुस्लिम भागीदारी को देखा। जनाब सबसिद्दीक जो उस समय के चीनी-राजा थे, ने बहिष्कार के रूप में अपना व्यवसाय छोड़ दिया। खोजा और मेमन समुदायों ने उस समय के सबसे बड़े व्यापारिक स्वामित्वों का स्वामित्व किया और वे बहिष्कार का समर्थन करने के लिए अपने क़ीमती उद्योगों से अलग हो गए!

1 9 42 के भारत छोड़ो आंदोलन वास्तव में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने कल्पना की थी। 8 अगस्त को उन्हें कैद और अहमदनगर को भेजा गया था, जिसके कारण गांधीजी को 9 अगस्त को आंदोलन का नेतृत्व करना पड़ा!

ज्योतिबा फुले को उनके पड़ोसी, उस्मान बागबान ने अपनी शैक्षिक गतिविधियों में प्रायोजित किया था, इतना कि वह स्कूल जिसे उन्होंने पढ़ाया था, श्री उस्मान ने किया था। उनकी बेटी, फातिमा वहां पहली लड़की थी और उसके बाद एक शिक्षक के रूप में शामिल हो गए थे!

मुस्लिम नेताओं ने हमेशा दलितों का समर्थन किया। लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में, मौलाना मोहम्मद अली जौहर को मुसलमानों की अन्य सभी मांगों को स्वीकार करने के बदले दलित कारणों को त्यागने में प्रलोभन हुआ था। लेकिन मौलाना जोहर ने दलितों को त्याग दिया!

जब डॉ। बी.आर. अम्बेडकर 1 9 46 के केंद्रीय चुनाव नहीं जीत सके, बंगाल मुस्लिम लीग ने अपनी अपनी एक सीट रिक्त कर दी और डॉ अंबेडकर को इसे प्रदान किया, जो उपचुनाव में इसे जीता। मुस्लिम लीग ने यह इशारा संविधान सभा में प्रवेश करने और बाकी के रूप में बताते हुए, इतिहास है!

मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों पत्रकारिता के क्षेत्र में भी सक्रिय थे। मौलाना आज़ाद ने औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा कई बार रोका जाने के बावजूद अंग्रेजों के खिलाफ अपनी कलम का इस्तेमाल किया। वास्तव में, भारत के स्वतंत्रता संग्राम के कारण हत्या करने वाले पहले पत्रकार भी मुस्लिम थे - मौलाना बाकर अली